02 सितंबर 2011

मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी ' सौदा ' (1714-1781) مرزا محمد رفیع سؔودا Mirza Muhammad Rafi 'Sauda'























दिल ! मत टपक नज़र से कि पाया न जाएगा
ज्यों अश्क फिर ज़मीं से उठाया न जाएगा

रुख़सत है बाग़बां कि टुक इक देख लें चमन
जाते हैं वां, जहां से फिर आया न जाएगा

तेग़े-जफ़ा-ए-यार से दिल ! सर न फेरियो
फिर मुंह वफ़ा को हम से दिखाया न जाएगा

काबा अगरचे टूटा तो क्या जा-ए-ग़म है शेख़
कुछ क़स्रे-दिल नहीं कि बनाया न जाएगा

ज़ालिम मैं कह रहा था कि तू इस ख़ू से दरगुज़र
'सौदा' का क़त्ल है यह, छुपाया न जाएगा

ज्यों अश्क - आंसू की तरह। ज़मीं -धरती । रुख़सत - विदा। बाग़बां - माली । चमन-उद्यान,वाटिका। वां - वहाँ। तेग़े-ज़फ़ा-ए-यार- प्रेमिका अथवा मित्र की अत्याचार रुपी तलवार। वफ़ा - प्रेम । अगरचे- यदि। जा-ए-ग़म - दुखी होने का कारण । क़स्रे-दिल -ह्रदय रुपी भवन । ख़ू- स्वभाव । दरगुज़र-अनदेखा करना,परे रहना।

01 सितंबर 2011

मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग ख़ाँ 'ग़ालिब'(1797-1869) مرزا اسد اللہ بیگ خان غؔالب Mirza 'Ghalib'






















रोने से और इश्क़ में बेबाक हो गए
धोए गए हम इतने कि बस पाक हो गए

कहता है कौन नाल-ए-बुलबुल को बेअसर
परदे में गुल के लाख जिगर चाक हो गए

पूछे है क्या वजूद-ओ-अदम अहले-शौक़ का
आप अपनी आग के ख़स-ओ-ख़ाशाक हो गए

करने गए थे उससे,तग़ाफ़ुल का हम गिला
की एक ही निगाह कि बस ख़ाक हो गए

इस रंग से उठाई कल उसने 'असद' की लाश
दुश्मन भी जिसको देख के ग़मनाक हो गए

बेबाक-निर्लज्ज । पाक-पवित्र । नाल-ए-बुलबुल-बुलबुल की करुण पुकार,आर्त्तनाद । गुल-फूल । चाक होना -फटना,दरार पड़ना ।वजूद-ओ-अदम- अस्तित्व एवं अनस्तित्व । अहले-शौक़-प्रेमी । ख़स-ओ-ख़ाशाक-कूड़ा-करकट । तग़ाफ़ुल-उपेक्षा । गिला-उलाहना । ख़ाक-मिटटी ।ख़ाक हो जाना - मिट जाना । ग़मनाक-दु:खी ।

मीर तक़ी 'मीर' (1722-1810) میر تقی مؔیر Meer Taqi 'Meer'



















इधर से अब्र उठ कर जो गया है
हमारी ख़ाक पर भी रो गया है

मसाइब और थे पर दिल का जाना
अजब इक सानिहा सा हो गया है

मुक़ामिरख़ाना-ए-आफ़ाक़ वह है
कि जो आया है याँ कुछ खो गया है

सरहाने 'मीर' के कोई न बोलो
अभी टुक रोते-रोते सो गया है

अब्र-बादल। मसाइब-समस्याएं,मुश्किलें ।सानिहा-दुर्घटना ।मुक़ामिरखाना-ए-आफ़ाक़ - संसार का जुआघर ।टुक-थोड़ा ।